समाज की इस तोड़-फोड़ में आगे निकलने की होड़ में टूटा हुआ एक परिंदा जैसे बोल रहा हूँ।
मैं लोक लोकतंत्र बोल.........
ना विचार ना व्यवहार में और ना ही संस्कार में, मैं हूँ बस व्यापार में,
सौदा मेरा हो रहा कभी नुक्कड़ कभी चौराहे और कभी गली बाजार में, इतना कुछ हुआ फिर भी खुद को तोल-मोल रहा हूँ।
मैं लोकतंत्र बोल........
जुल्म हुआ किस पर, किया किसने , नाम मेरा बदनाम हो गया ,बात आई नारी इज़्ज़त की तो सरे राह नीलाम हो गया,
इतना कुछ हुआ, बावजूद उसके देश के लिए गली- गली नवसंचरण की राह टटोल रहा हूं
मैं लोकतंत्र बोल......
चंद शब्दों का नाम मेरा, जिम्मेदारी तमाम रखता हूं,
ना लगे कोई धब्बा मुझ पर, इसलिए तकरीरे हज़ार रखता हूं।