लेख बहुत ही द्रवित और कठोर शब्दो में लिखना पड़ गया। क्योंकि पिछले कुछ सालों में मानवता का जो नंगा नाच देश के अलग अलग प्रदेशों में देखने और सुनने को मिल रहा है, उससे आत्मा पूरी तरह टूट जाती है। इंसानियत और मानवता जैसे शब्दों से विश्वाश ही उठ जाता है। ये आवाज़ मेरी नही देश के हर उस इंसान की जिनके अंदर अभी कुछ इंसानियत बची है। अन्यथा वर्तमान में हर जगह हैवानियत के गिद्ध नज़र गड़ाए बैठे है। हर समाचार पत्र, मैगजीन,न्यूज़ चैनल, रेडियो आदि सब जगह अन्य खबरों से ज़्यादा बलात्कार,रेप, यौन शोषण,कुकर्म,हत्या की ख़बर बहुत अधिक मिलती है।कुछ दिनों से नाबालिक लड़कियों के साथ रेप और फिर उनकी हत्या की ख़बर लगातार न्यूज़ चैनल और अखबारों में देखने और पढ़ने को मिल रही। यही नही न्यूज़ चैनल और अख़बार भी इन खबरों को तवज्जो दे रहे है। क्योंकि टीआरपी और सर्कुलेशन का मामला है। लेकिन सभी न्यूज़ चैनल और अखबार ये क्यों भूल जाते है कि जिसकी बच्ची के साथ ये दिल दहला देनी वाली घटना हुई है, उन पर क्या बीत रही होगी। सच दिखाना गलत नही लेकिन उस सच को अपनी टीआरपी की चाशनी में भिगोकर दिखाना और बताना कहां तक सही है,इस पर विचार करना चाहिए।
बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ, सुकन्या योजना, उज्जवला योजना, कौशल विकास योजना ऐसी अनगिनत योजना जिनको केंद्र सरकार ने लड़कियों और महिलाओं के लिए चलाया इसी तरह हर राज्य में लड़कियों के लिए अलग अलग तरह की योजना चलाई जाती है। लेकिन उनका कितना प्रभाव समाज पर पड़ा है, वह कितना बदलाव आया तथा कितना लाभ लड़कियों को मिला है, और कितनी इज़्ज़त इस अंधे-बहरे समाज से लड़कियों को मिल रही है। समाज में लगातार बढ़ रही इस हवस की बीमारी का कोई इलाज जरूर ढूंढना पड़ेगा। वरना भविष्य में लड़कियां पैदा करना दूर लड़की शब्द सुनने को भी कान तरस जाएंगे। इतने बड़े देश की गाथा जहां पूरा विश्व गाता है। उस देश के समाज में इतनी भयंकर बीमारी फेल रही है इसका अभी शायद बाहर किसी को कोई खबर ही नही है। यही नही महापुरषों, वीर योद्धाओं साधु-संतों और पीर पैगम्बरों व अपनी संस्कृति से विश्वपटल पर अपनी धाक रखने वाले देश में लड़कियों की ये दशा दयनीय है।
"किसी ने ठीक कहा है जिस देश में स्त्री का सम्मान नही होता वह देश कुछ समय पश्चात टुकड़ो टुकड़ो में बंट जाता है। और उसको कोई नही बचा सकता।"
जय हिंद ( शिव कुमार)
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